Khwaja Ahmed Abbas – The Crusader

Khwaja_Ahmed_Abbas_03_-_www.filmkailm.comख्वाजा अहमद अब्बास की रूह कभी भी हदों की मुहताज नहीं रही । जिंदगी की जददोजहद में भी इस इंसान की पहचान उसी तेवर से कायम रही । उम्रदराजी के सत्तरवें मुकाम पर जानलेवा बीमारी के शिकार होकर अस्पताल में पडे रहे। आंखे साथ नहीं दे रही थी फिर भी अपने पराए की पहचान आपको थी । दोस्तों के दरम्यान आप ख्वाजा के नाम से मशहूर हुए। आपके दोस्तों की फेहरिस्त इस मायने में बहुत अनोखी है कि हर उम्र के लोग शामिल थे। कलात्मक खूबसुरती को लेकर नौजवानों में एक खास किस्म की दीवानगी है। जिंदगी के आधे बसंत देख चुके आलोचक । यहां आपके हमउम्र तरक्कीपसंद दोस्त भी हैं। मोतियाबिंद से मात खायी आंखों के साथ भी लिखना नहीं छोडा। पांव से मजबूर हुए लेकिन हौसला कम नहीं होने दिया। मदद मिलने की दीवानगी में इधर उधर मारे फिरे। रूपया रखे बिना फिल्म बनाने की हिम्मत रखने वाले उस शख्स की जिंदगी में यह मामूली रूकावटें थी। आपने सुधार-इसलाह या बदलाव की पैरवी करने वाले तबकों को साथ लाया ।

फिल्मों के जरिए एक वतनपरस्त मुहिम को चला रहे थे। सुधारवादी फिल्मों के मशहूर होने से काफी पहले आपने सिनेमा को सामाजिक बदलाव का मक़बूल पैरोकार बना लिया था। हिन्दुस्तानी सिनेमा को आपकी सेवाएं याद करने का वाजिब वक्त है। चार दशक के सफर में अब्बास सिनेमा के अगुआ बनकर रहे। सिनेमा में नयी चीजों का ईजाद किया, फिल्मों को धर्मयुध का जरिया बनाया।  फिल्मों में हिन्दुस्तान के मिली जुली विरासत जोकि सामाजिक नजरिए से कारगर हो, मुल्क के महान इतिहास के बरक्स आज की कडवी हक़ीकत को बयान करना। लेकिन सबसे अव्वल सबकी खातिर रोटी कपडा मकान की मुहिम का खुला इस्तकबाल करना था। फिल्मों में पेश किए गए सामाजिक बातों को अब्बास ने मिलता हुआ नाम ना देकर नेहरू युगीन सौंदर्य कहा। जवाहरलाल नेहरू व नेहरूवाद को लेकर आपकी मुहब्बत का अंदाजा लगाया जा सकता है।Khwaja_Ahmed_Abbas_04_-_www.filmkailm.com

देश के सिनेमा में अब्बास साहेब के दखल वाली फिल्मों में नेहरू युगीन कलात्मक सौंदर्य जाहिर हुआ था। अब्बास का वतनपरस्त जज्बा उस वक्त भी बराबर बना हुआ रहा जब आप मुख्यधारा में  फिल्में लिख रहे थे। आपका हरेक दखल यादगर बन गया,एक काबिले तारीफ सहयोग । अब्बास साहेब की तकरीबन हरेक दखल ने हिन्दुस्तानी सिनेमा को महान अदाकार या फिल्म से नवाज दिया। आवारा जिससे राजकपूर मकबूलियत की चोटी पर आ पहुंचे…आवारा ने राज साहेब को नयी जिंदगी दी। धरती के लाल ने अकाल के हालात में एकजुटता का नारा बुलंद किया। सात हिन्दुस्तानी में अमिताभ बच्चन फिर मिथुन चक्रवर्ती भी आपकी तालाश थे। आपकी दो बूंद पानी ने विकास को एक नए किस्म के तेवर में दिखाया। बाल फिल्मों की तहरीक में मुन्ना से पहल करना। राजकपूर की बाबी में एक अलग तेवर वाली रूमानियत थी। इन सबमें अपने जमाने की तकनीकी हदों व फिल्मकार की हद दर्जा ईमानदारी से लिपटी शहर और सपना भारतीय सिनेमा में मक़बूल मुकाम रखती है। हक़ीकत और सामाजिक संदेश की कारगार पेशकश। मालूम होकि सामानांतर सिनेमा इंकलाब के बहुत पहले आपने इंकलाब शुरु किया था। आपके सिनेमा की नेहरूवाद जडें खुद अब्बास साहेब की नीजि जिंदगी से जुडी थी।I_am_not_an_island_-_www.filmkailm.com

सात जून जोकि आपकी जन्म की तारीख थी…तारीख को लेकर आप खुद यकीन में नहीं रहे। बचपन के दिनों से ही आजादी को लेकर दीवाने थे। जीवनी ‘आई एम नोट एन आइलेंड’ में बालक अब्बास व उनके साथियों से अंग्रेजी हुकूमत के फायदे गिनाने को कहा गए एक घटना का बयान है। अंग्रेज स्कूल इंस्पेक्टर ने आप लोगों की सुहुलत के लिए अस्पतालों व डाक खानों का नाम लिया। अब्बास का उसमें सुर मिलाकर क़ैदखानों का नाम जोड देना इंस्पेक्टर के होश उडा गया। अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी में गुजारे दिनों का जिंदगी पर बडा असर रहा। बदलाव की लहर के अगुआ लेखक सज्जाद जहीर व कैफी आज़मी को करीब से देखा। फासीवादी ताकतों को मुकाबले समाजवाद की तहरीक का हिस्सा रहे। युरोप व चीन के सफर पर उस जमाने में गए जब वहां मासूम लोग मारे जा रहे थे। अमन व भाईचारा मुश्किल दिनों से गुजर रहा था। अब्बास की बहुआयामी शख्सियत को इन सब ने गढा। नीजि विचारधारा ने जोकि ताउम्र वामपंथी बनी रही ने भी एक अलग मुकाम दिया। अदब एवम सिनेमा के नए फार्म को लेकर आपके नजरिए का भी जिक्र करना चाहिए।

अब्बास कम्युनिस्ट एकजुटता के कटटर पैरोकार रहे। कांग्रेस की अगुवाई में चल रही आजादी की लडाई में वामपंथ विचारधारा का दखल अहम था। मशहूर अखबारों के लिए लिखे फिल्म रिव्युज में आपने सामाजिक उपयोगिता व आलोचनात्मक हक़ीकत को सिनेमा के लिए बेहद जरूरी माना। देश में उभरते हुए सिनेमा विरासत में इन बातों को बहुत जरूरी बताया। फिल्मों में शुरू हुई बहसों व संदेशों को फिल्मकारी से बढकर महत्व दिया जाना ताकि बातें मामूली हिस्सेदारी तक सीमट कर रह ना जाएं।  बेशक अब्बास की फिल्में जीवन व समाज की कडवी सच्चाइयों को लेकर चल रही थी। यह फिल्में तकनीकी नजरिए से थोडी कमजोर जरूर रही, लेकिन इनमें नयी बहसों को ढलते हुए देखा जा सकता है। तकनीक वगैरह पर बेमानी खर्च करने के लिए आपके पास रूपया नहीं था। शुरुआती तीन-चार फिल्मों से ही आपकी इंसानपरस्त शख्सियत जाहिर हो चुकी थी। चीन के सफर से लौटकर अब्बास ने माओ के हिन्दुस्तानी साथी पर ‘डाक्टर कोटनीस की अमर कहानी’ लिखी। इस कहानी पर बनी फिल्म में वी शांताराम खुद ही डाक्टर कोटनीस बने थे। वी शांताराम ने अपने किस्म की अदाकारी को कायम किया था। अदाकारी के नजरिए से शांताराम की यह फिल्म कमजोर मालूम पडे …लेकिन अब्बास की कहानी ने समकालीन राजनीतिक उम्मीदों की पैरवी करते हुए एशियाई मुल्कों के साथ हमारे रिश्तों को नए उजाले में देखा। हमारे आजादी के नारे को एशिया की संवेदना हासिल कराने में फिल्म का अहम रोल था।Dharti_ke_lal_-_www.filmkailm.com

चालीस दशक की ‘धरती के लाल’ सन छयालिस के फिरकापरस्त फसादों के बीच में रिलीज हुई थी। बांबे में फसादों का सिलसिला चल निकला था। यह फिल्म अपने वक्त की जमीनी सच्चाइयों का दस्तावेज बनी। अब्बास की यह फिल्म अब भी मायने रखती है। फिल्म संस्थाओं की बुनियाद रखने वाले, फिल्मों के रिव्यु लेखक, भारतीय जन नाट्य इंकलाब के सदस्य…ख्वाजा अहमद अब्बास ने खुद को यकायक सिनेमा में नए इंकलाब का अगुआ पाया। आपके हमसाथियों में चेतन आनंद जोकि नीचा नगर के लिए मशहूर हुए। फिर वी पी साठे का जिक्र किया जा सकता है। इन साथियों ने आपको हर मुम्किन हौसला दिया। अपने ऊपर पडे बडे कर्ज़ से उबरने की कहानी अलग थी। इस कीमत का बडा हिस्सा आपने ‘आखिरी पन्ना’ कालम लिखकर जमा किया था। यह कालम रिकार्ड अरसे तक साया होता रहा।

अनहोनी की कहानी लिखने के बीच,अब्बास साहेब ने हिन्दुस्तानी सिनेमा व राजकपूर की किस्मत बदल देनी वाली फिल्म ‘आवारा’ लिखी। इसकी जडें चैपलीन के मशहूर ट्रांप में जरूर रहीं लेकिन नेहरू का दिया समाजवाद व समानता का नारा भी इसकी जडों में था। गरीब ने कभी ख्वाब देखा नहीं । वो बस बेहतर दिनों की दुआ भर कर सकते हैं। मुफलिस नौजवान -अमीर राजकुमारी के प्यार को नयी रोशनी में रखा गया। सामाजिक बराबरी व इंसाफ का दस्तावेज बनाया गया। कहानी में शायरी-गानों के नायाब नमूने जोडकर राजकपूर ने इसे काफी दिलचस्प बना दिया था। ब्लेक एंड वाइट फीचर फिल्म में कैमरा का काम उस जमाने के मकबूल कामों की बराबरी करता नजर आया। शायरी का जादुई असर इंसानी जज्बातों को असर कर जाता है। मशहूर ‘अवारा हूं’ हिन्दुस्तान से लेकर रूस- ताशकंत- लंदन की गलियों तक सुना गया। राजकपूर की जिंदगी में ‘अवारा’ किस्मत बदलने का मुकाम बन कर आई। बहुत से मामलों में आवारा ने अपने किस्म की फिल्में जिनमें बाहरी खूबसुरती एवम स्टीरियोटाईप सीखें नहीं मिलती को कामयाब बनाया। फिल्म से राजकपूर-अब्बास के बीच मजबूत रिश्तों को वजह मिली। दोस्ती आपके ख्वाबों को पूरा कर सकी क्योंकि राज साहेब से मिले रूपए को अपनी फिल्मों पर खर्च किया। इक बंदानवाज़ ने जब आपसे यह जानना चाहा कि धरती के लाल व अवारा किस्म की महान फिल्मों के बाद ‘बाबी’ तरह की कहानी क्यों लिखी? जवाब मिला… इसलिए ताकि दो बूंद पानी-सात हिन्दुस्तानी-नक्सलाईट की खातिर रूपया जुटा सकूं!

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हालांकि देशभक्ति व सेक्युलरवाद को लेकर चली ‘सात हिन्दुस्तानी’ अमिताभ की पहली फिल्म होकर काफी मकबूल हुई। लेकिन अब्बास की ‘शहर और सपना’ इस मामले में काफी महान रही क्योंकि पहली मर्तबा ही शायद उस जमाने के जवलंत सवालों की फिक्र में एक बडी फिल्म बनी थी। सिनेमा के बाहरी दिखावों से आज़ाद यह फिल्म बेवजह की सिनेमाई आतिशबाजी में नहीं फंसी। देहात व शहर के दरम्यान की बहसों पर रोशनी डालने वाली यह कहानी बडे शहरों में अशियाना व आबुदाना की मुश्किलों-तकलीफों की बात कह गयी। लेकिन यही नहीं झुग्गियों के शोषित माहौल में जीने की चाह,भारतीय मानसिकता के हौसले की तालाश थी। शहर और सपना के नायाब असर को स्मिता पाटिल की फिल्म चक्र में दुहराने की कोशिश हुई। अब्बास साहेब की बराबरी हो ना सकी। हडबडी में अमीर बनने के नए चलन पर रोशनी डालती ‘बंबई रात की बाहों में’ महानगर की अमानवीय हक़ीकतों को बयान करने में सफल हुई। बंबई की जिंदगी को लेकर आप काफी सोंचा करते होंगे। आसमान महल के बाद अब्बास की तरफ से फिल्में बहुत कम आने लगी। सात हिन्दुतानी व फासला फिर नक्सलाइट देश के सिनेमा में राजनीतिक फिल्मों की पहल के दिनों की याद दिलाती है। इस किस्म की फिल्मों से सिनेमा की नयी जुबान को सांस मिली,अब्बास के लफ्जों से संवरी हुयी। अहिस्ता अहिस्ता तकनीक का जमाना बढने से अब्बास की फिल्में बेजान सी होने लगी। अब्बास के किस्म का सिनेमा अब जोखिम काम हो गया था।Khwaja_Ahmed_Abbas_01_-_www.filmkailm.com

Contributed by Syed S Tauheed.

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