Dev Anand’s Hum Dono – A Tribute in Hindi

Hum_Dono_1961_-_Poster_1_-_www.filmkailm.com‘अपने हाथों की कमाई हुई सुखी रोटी भी…’ ‘

“तुम भी सुखी रोटी में यकीन करने वाले हो! जिसने हमेशा पुलाव खाएं हो,उसे सुखी रोटी मे कविता नज़र आती है, जो गरीबी से कोसों दूर रहा हो उसे गरीबीमे ‘रोमांस’ नज़र आता है| लेकिन कविता और रोमांस अमीरों के दिल बहलाव की चीज़े हैं, और सुखी रोटी……उसे चबाना पडता है, निगलना पडता है,पचाना पडता है |”

“गरीबी ज़िन्दगी का एक शाप है आनंद साहब ! जिससे निकलना इंसान का फ़र्ज़ है, जानबुझ कर पडना हिमाकत ! जो अपने प्यार के खातिर  सौ रुपए तक की नौकरी ना पा सका, वह प्यार का मतलब समझाने आया है | तुम आए हो मीता (साधना)  से उसका आराम और सुख छीनने,एक सुखी रोटी का वादा लेकर, तो ले जाओ ! वह तो है ही नादान | कितने दिनो तक अपने साथ रखोगे, तुम ज़िन्दगी भर उसे इतना नही दे पाओगे, जितना मीता अपने एक जन्मदिन पर खर्च कर देती है ! “

Dev_Anand_and_Jagirdar_-_www.filmkailm.comरोजगार के बिना प्यार मुकम्मल नहीं होगा की सच्चाई आनंद जानता था। मीता के पिता की चुभती बात किंतु जिंदगी की एक हक़ीकत को अनुभव कर आनंद (देव आनंद ) बाहर निकल जाता है |  रोजगार के बिना जिंदगी को जीना कभी मुम्किन नहीं होगा की सच्चाई  प्यार व जिंदगी को लेकर एक बदलाव उसमें घटित हो गया था। खुद को जिंदगी की हक़ीकत के लायक बनाने का संकल्प लेकर वह पुराने आनंद को पीछे छोड आया था। फौज मे भर्ती का विज्ञापन दिखाई देना हीरो के जीवन में नएपन को दिखाने के लिए काफी सटीक था।

हम देखते हैं कि आनंद फ़ौज में दाखिल हो जाता है | वहां उसकी मुलाकात अपने ‘हमशक्ल’ मेजर वर्मा से होती है, एक ही शक्ल, एक फ़ौज और एक शहर का संयोग दोनो को नज़दीक ले आता है। इस मोड से आनंद व मेजर वर्मा की कहानियां आकर मिल जाती हैं। हमशक्ल होने की वजह से दो अलग इतिहास अनजाने में ही एक दूसरे के जीवन में प्रवेश कर जाते हैं।

आनंद व खुद को एक जगह देखकर मेजर वर्मा कहते है :

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भगवान मे मुझे यकीन नही, लेकिन किस्मत ज़रुर कोई चीज़ है ! वर्ना एक से चेहरे, एक फ़ौज ,एक जगह …बडी खुशी की बात है !

किसी जंग के दौरान मेजर वर्मा गंभीर रूप से घायल हो गए, दुश्मनों के हमलों का सामना करते हुए इस नाजुक हालात में आए थे। इस हालत मे वो अभिन्न मित्र आनंद से अपनी गैर-मौजुदगी या मारे जाने के स्थिति मे उनके घर की ज़िम्मेदारी  निभाने का वायदा लेता है। दोस्ती की खातिर आनंद को अपने मित्र ना चाहते हुए भी मानना पडा। इस मोड से कहानी में नए दिलचस्प मोड बनते हैं। उस दिन के बाद  मेजर वर्मा यकायक लडाई के मोर्चे से गायब हो गए। कुछ दिनों बाद उनके लापता और मारे जाने की खबर मिलती है |

Dev_Anand_and_Nanda_2_-_www.filmkailm.comफ़ौज से छुटकर आनंद मेजर और खुद के दायित्वों को निभाने  के लिए मेजर के परिवार के पास आया जहां मेजर की धर्मपत्नी रूमा (नंदा) पति के वापसी की बाट जोह रही थी। इंतजार में रूमा बीमार हो चुकी थी। वो आनंद अपना खोया हुआ पति मान रही, आनंद भी इस सच नहीं बता सकता क्योंकि रुमा शायद इसे बर्दाश्त ना कर सकेगी।  रुमा से हक़ीकत जाहिर नहीं करना हालात के मददेनजर उसे ठीक लगा।

अब आनंद को धर्म-संकट से गुज़रना होगा। वो रूमा से पत्नी से ऊपर का नाता रखने का निर्णय लेता है। असली नकली की विपरीत दायित्वों की परीक्षा से गुज़रते वो बहुद हद तक सफल हो  रहा था। लेकिन इस मोड पर एक अप्रत्याशित हक़ीकत सामने आती है| दर्शक के नजरिए से…लेकिन आनंद तो उस दिन के इंतजार में जी रहा था। फ़िल्म के तीसरे हिस्से में मेजर वर्मा को जीवित दिखाया जाता है…! मेजर अब वो नहीं रहा, जंग में लापता हुआ मेजर अब अपाहिज था। हारे हुए सिपाही की कमजोरी में उलझा हुआ शख्स सा । वापसी पर अपने घर जाने की हिम्मत जुटाने के बजाए रुमा-आनंद पर शक करने लगा। मेजर को यह भी डर था कि अपाहिज हो जाने बाद क्या रुमा अब भी पहले जितना प्यार उसे देगी?

बहकावे में व अपनी कमजोरी में फंसकर वो रुमा-आनंद के रिश्ते पर शक करने लगा था। पति का मजा लेना आनंद की जगह पर होकर आसान था। गलत भावनाएं लेकिन आनंद को डिगा नहीं सकी। वो रूमा का पति नहीं जीवन का देवता होकर जी रहा था। आनंद को इस परीक्षा में सफल होना होगा क्योंकि मीता उसी के इंतजार में दुनिया को ठुकराए हुए थी। मेजर को डर था कि अपाहिज हो जाने बाद क्या रुमा अब भी पहले जितना प्यार उसे देगी?

Hum Dono 1961 - Climax - www.filmkailm.comअसली-नकली के धर्मसंकट से उभरने के लिए आनंद एक योजना बनाता है। हकीकत से रूबरू करने के लिए वो रूमा मीता व मेजर वर्मा को एक जगह बुलाता है । दूसरे की हकीकत से रूबरू होकर पूरी बात को जानना तीनों के लिए जरूरी था।  स्वयं के प्रति रुमा का असीम समर्पण देखकर मेजर को किए पर पछतावा होता है। सुखद समापन में रुमा को उसका असल पति मेजर वर्मा जबकि मीता को आनंद का साथ मिल जाता है।

Dev_Anand_and_Sadhna_3_-_www.filmkailm.comसाठ दशक में रिलीज हमदोनों में भारतीय आदर्श व मूल्य कहानी का अहम हिस्सा थे।  आस्था-विश्वास एवं पारिवारिक मूल्यों का महत्व बताया गया । दोस्ती वफा में विश्वास कायम किया गया। हमशक्ल के इत्तेफाक पर बनी पटकथाओं में अहम । पात्रों के व्यक्तित्व को परखने के लिए कथा में संघर्ष का भाव था। किरदार इसमें विजयी होकर सामने आए। अब उनका व दर्शकों का एकात्म हो गया था। यही खुबसुरती किसी कहानी को सफल बनाती है।

युं तो यह देव आनंद की फिल्म थी फिर भी नंदा व साधना की भूमिकाओं को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता । रूमा व मीता के किरदार आनंद व मेजर वर्मा के किरदारों को मुकम्मल कर रहे थे। पतिव्रता नारी के रूप में नंदा का अभिनय उम्दा था। उधर आनंद की खातिर जीवन भर इंतजार करने का संकल्प लिए हुए मीता का किरदार भी। \

साहिर के गीतों ‘हर फ़िक्र को धुएं मे उडाता चला गया, अभी ना जाओ छोडकर, कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया और सदाबहार भजन ‘अल्लाह तेरो नाम,इश्वर तेरो नाम’ को बार-बार गुनगुनाया जा सकता है | यह गीत आज भी रेडियो टीवी पर प्रसारित होते हैं।

Nanda_-_Allah_tero_naam_-_www.filmkailm.comदिवंगत अभिनेत्री नंदा पर फिल्माया गया भजन हिंदी सिनेमा के बेहतरीन भजनों में एक है। देव आनंद पर फिल्माया ‘कभी हालात कभी खुद’ को भी साहिर के सबसे बेहतरीन गीतों में रखा जा सकता है । जयदेव का संगीत अपने उत्तम स्तर पर था। विजय आनंद की पटकथा हमशक्लों की उलझन को दिलचस्प अंदाज में पेश करने में सफल था। देव आनंद साहिर व जयदेव की सफर की एक जरूरी फिल्म।
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Syed S Tauheed

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